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बाबा को नहीं रास आई थी इंजीनियरिंग, ऐसे रची पाखंड की दुनिया

रेप केस में फंसे बलात्कारी बाबा फलहारी महाराज के बारे में एक के बाद एक खुलासे होते जा रहे हैं। 12वीं पास कर इलाहाबाद नैनी इंस्टिट्यूट से आईटीआई में डिप्लोमा प्राप्त करने वाले फलाहारी बाबा को इंजीनियरिंग रास नहीं आया। उसने डिप्लोमा करने के बाद भी धर्म-ग्रंथों से लगाव बनाए रखा औऱ बाद में पाखंड की एक दुनिया बसा दी।

जानकारी के मुताबिक गौतम मिश्रा का मन पूजा-पाठ और सामाजिक कार्य में लगा रहता था। रामायण और अन्य ग्रंथों का घर में अध्ययन किया करता था। अचानक एक दिन बिना बताए हुए वह घर से निकल गया। घर से निकलने के बाद वह संत का रूप धारण कर इलाहाबाद अर्धकुंभ में 1 महीने का कल्पवास किया। जब गांव के लोग इलाहाबाद स्नान के लिए गए तो शिवपूजन मिश्रा से लोग मिले तो उसने पहचानने से इनकार कर दिया।

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गौतम मिश्रा के द्वारा न पहचानने के बाद गांव वालों ने जब विस्तार से पता किया तो मालूम पड़ा कि वह अब बाबा बन चुका है। तब से उसने अपने परिवार व गांव वालों से रिश्ता तोड़ लिया। अपने मां-बाप की मर जाने के बाद भी वह घर नहीं गया। छोटा भाई गांव में खेती करता है और इनकी एक पत्नी और शादीशुदा बेटी है। 

उत्तरप्रदेश के कौशाम्बी जिले के कौशांबी के डकशरीरा (महेवाघाट) गांव के रहने वाला शिवपूजन गौतम मिश्रा धीरे-धीरे फलाहारी महाराज बन गया। बाबा अपने भक्तों को मां-बाप की सेवा करने की शिक्षा देता है लेकिन खुद के माता-बाप के मौत के बाद भी गांव नहीं लौटा था। फलाहारी बाबा खुद करोड़ों की संपति का मालिक बन गया लेकिन उसका एक भाई आज भी गांव में झोपड़ियों में रहता है और खेती कर जीवन यापन करता है।

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कौशांबी के डकशरीरा (महेवाघाट) गांव के रहने वाले बाबा के बारे में सोशल मीडिया, अखबारों व चैनलों में खबरें आने के बाद लोगों का उसके घर पर आना-जाना शुरू हो गया है। बाबा के छोटे भाई का नाम राजनारायण मिश्रा हैं। उनका कहना है कि बाबा को झूठे मामले में फंसाया गया है। डकशरीरा में बाबा का घर आज भी कच्चा छप्पर का बना हुआ है। 

फलाहारी बाबा ने अपना घर 30 साल पहले ही छोड़ दिया था। ग्रामीणों ने जब कुंभ में देखा तो गांव वापिस लौटकर बाबा के परिजनों को बताया था कि वह कुंभ मेले में हैं और संत बन गया है। इसके बाद जब लोग गए तो बाबा से मिले। अक्सर गांव के लोग उनसे कुंभ में ही मिलता था।

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फलाहारी जी महाराज 1990 के दशक में अलवर में आये थे और स्किम दो में स्थित बैकुंठधाम मंदिर में बड़ा यज्ञ किया और अलवर में अपना शिष्य बनाने के काम शुरू किया। इसके बाद अशोका टॉकीज के पास नारायणी धर्मशाला में रहने लगा। जिस वक्त बाबा आया उस वक्त उसके पास कुछ नहीं था और कथा सुनाकर अपनी जीविकोपार्जन करता था।

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फलाहारी बाबा अलवर में दो साल तक कई धर्मशालाओं में रहा। उसके बाद स्कीम नं. 2 स्थित फलहारी बाबा ने बैकुंठधाम में हवन एवं कथा का वाचन किया। इसके बाद बाबा नारायणी धर्मशाला में रहने लगा और 7 साल बाद फलाहारी महाराज को अशोका टॉकीज के पास स्थित नारायाणी धर्मशाला से बेदखल कर दिया गया। इस दौरान फलहारी महाराज ने कई साभ्रांत परिवारों से नाता जोड़ लिया। परिणामस्वरूप 1998 में काला कुआं के समीप 400 वर्ग गज जमीन लेकर अपना आश्रम बनाया। इसके बाद बाबा ने पलटकर नहीं देखा।

बाबा करोड़ों की सम्पत्ति का मालिक बन गया। बाबा ने अपने रसुखातों के चलते दक्षिण की तर्ज पर वैंकेटेश बालाजी का मंदिर बनवाया जिसमें करोड़ों रुपये खर्च हुए। बाबा का हर बड़े नेता से सम्पर्क रहा है। उसी का बाबा फायदा उठाता था। बाबा के अलवर के अलावा छतीसगढ़ के पेण्ड्रा में ओर एमपी के चित्रकूट में आश्रम बने हुए है। 

बाबा को नहीं रास आई थी इंजीनियरिंग, ऐसे रची पाखंड की दुनिया बाबा को नहीं रास आई थी इंजीनियरिंग, ऐसे रची पाखंड की दुनिया

Reviewed by Rakesh Kumar on September 27, 2017 Rating: 5

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